विषय सूची (Table of Contents)
- 'प्रति बूंद अधिक फसल' (PDMC) योजना: ऐतिहासिक विकासक्रम और संस्थागत संरचना: वर्ष 2006 में शुरुआत से लेकर 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना' (PM-RKVY) के अंतर्गत इसके वर्तमान क्रियान्वयन तक की नीतिगत यात्रा। (GS Paper II: शासन व्यवस्था - सरकारी नीतियां और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप)
- तकनीकी विशिष्टताएं और वित्तीय सहायता का ढांचा: लाभार्थी पात्रता, लघु एवं सीमांत किसानों के लिए सब्सिडी के प्रावधान और ड्रिप तथा स्प्रिंकलर प्रणालियों के प्रकार। (GS Paper III: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी - स्वदेशी तकनीक का विकास और कृषि क्षेत्र में नवाचार)
- जल संरक्षण के नए नियम और बढ़ी हुई बजटीय स्वतंत्रता: राज्यों को स्थानीय स्तर पर जल भंडारण तालाब (diggis) और जल संचयन प्रणालियों के निर्माण के लिए दी गई पूर्ण बजटीय स्वतंत्रता। (GS Paper II & III: केंद्र-राज्य संबंध, वित्तीय संघवाद और संसाधन जुटाना)
- रणनीतिक, आर्थिक और व्यावहारिक प्रभाव (Impact Assessment): नीति आयोग, आर्थिक समीक्षा और आईआईएम अहमदाबाद (IIMA) के स्वतंत्र मूल्यांकन अध्ययनों से प्राप्त ठोस वैज्ञानिक आंकड़े। (GS Paper III: आर्थिक विकास - कृषि उत्पादकता, सिंचाई प्रणालियां और आजीविका सुरक्षा)
- सफलता की वास्तविक कहानी (Case Study): आंध्र प्रदेश के किसान श्रीनिवास राव द्वारा पारंपरिक बाढ़ सिंचाई से ड्रिप सिंचाई अपनाने का आर्थिक विश्लेषण। (GS Paper III: कृषि - किसानों की आय का दोहरीकरण और संविदात्मक उद्यम साझेदारी)
- निष्कर्ष / UPSC के लिए मुख्य बिंदु: प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण से नीतिगत सार।
- सामान्य प्रश्न (FAQs)
- UPSC प्रारंभिक परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न (Practice MCQs)
1. 'प्रति बूंद अधिक फसल' (PDMC) योजना: ऐतिहासिक विकासक्रम और संस्थागत संरचना
नीतिगत पृष्ठभूमि (Policy Context)
भारत में कृषि उत्पादकता को स्थिर करने और भूजल दोहन को कम करने के उद्देश्य से सूक्ष्म सिंचाई (micro-irrigation) को संस्थागत बढ़ावा दिया जा रहा है। पीडीएमसी योजना का नीतिगत विकासक्रम इस प्रकार रहा है:
जनवरी 2006: इसकी शुरुआत 'बूंद-बूंद सिंचाई के लिए केंद्र प्रायोजित योजना' (Centrally Sponsored Scheme - CSS) के रूप में हुई।
वर्ष 2010-11: इसे 'राष्ट्रीय बूंद-बूंद सिंचाई मिशन' (National Mission on Micro Irrigation - NMMI) के रूप में विस्तारित किया गया।
वित्त वर्ष 2014-15: इसे 'राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन' (National Mission on Sustainable Agriculture - NMSA) के 'कृषि जल प्रबंधन' (On Farm Water Management - OFWM) घटक में मिलाया गया।
वित्त वर्ष 2015-16 से 2021-22: इसे 'प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना' (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana - PMKSY) के प्रमुख घटक के रूप में 'प्रति बूंद अधिक फसल' (PDMC) नाम दिया गया।
वर्ष 2022-23 से वर्तमान: इसे 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना' (Pradhan Mantri Rashtriya Krishi Vikas Yojana - PM-RKVY) के छाता कार्यक्रम (umbrella scheme) के अंतर्गत लागू किया जा रहा है।
संस्थागत ढांचा (Implementation Framework)
पीएम-आरकेवीवाई (PM-RKVY) के समग्र प्रशासनिक ढांचे के तहत पीडीएमसी का त्रि-स्तरीय क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाता है:
राष्ट्रीय स्तर पर: रणनीतिक मार्गदर्शन और योजना बनाने के लिए 'राष्ट्रीय प्रबंधन परिषद' (National Stewardship Council - NSC) सर्वोच्च निकाय है।
राज्य स्तर पर: राज्य स्तरीय स्वीकृति समिति (State Level Sanctioning Committee - SLSC) योजनाओं को मंजूरी देती है, जबकि अंतर-विभागीय कार्य समूह (Inter-Departmental Working Group - IDWG) विभागों के बीच समन्वय करता है।
जिला स्तर पर: जिला स्तरीय कार्यान्वयन समिति (District Level Implementation Committee - DLIC) प्रत्यक्ष निष्पादन की देखरेख करती है।
2. तकनीकी विशिष्टताएं और वित्तीय सहायता का ढांचा
वित्तीय सहायता और सब्सिडी (Financial Assistance & Subsidy)
पात्रता सीमा: योजना के अंतर्गत प्रति लाभार्थी अधिकतम 5 हेक्टेयर भूमि तक सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।
सब्सिडी वितरण: छोटे और सीमांत किसानों (small and marginal farmers) को कुल लागत का 55 प्रतिशत, जबकि अन्य श्रेणी के किसानों को 45 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
पुनः सहायता का प्रावधान: किसानों को एक ही कृषि भूमि पर इस प्रणाली के नवीनीकरण या पुन: स्थापना के लिए 7 वर्ष बाद दोबारा वित्तीय सहायता प्राप्त करने की पात्रता है।
वित्तीय प्रवाह: पिछले तीन वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा 8,123.24 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता जारी की गई है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए, पीएम-आरकेवीवाई के स्वीकृत 8,957.72 करोड़ रुपये के बजट में से 3,226.36 करोड़ रुपये विशेष रूप से पीडीएमसी के लिए समर्पित किए गए हैं।
सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के वैज्ञानिक प्रकार (Types of Micro-Irrigation Systems)
पीडीएमसी के तहत मुख्य रूप से दो प्रकार की कुशल सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाता है:
A. ड्रिप सिंचाई प्रणाली (Drip Irrigation System): यह तकनीक पतली नलिकाओं या पाइपों में लगे छोटे उत्सर्जकों (emitters) के माध्यम से पानी को सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाती है, जिससे पानी की बर्बादी न्यूनतम होती है। इसके दो रूप हैं:
ऑन-लाइन ड्रिप (On-line Drip): इसमें असमान दूरी पर लगी फसलों के लिए पौधों की अवस्थिति के अनुसार पाइप पर बाहर से ड्रिपर्स लगाए जाते हैं।
इन-लाइन ड्रिप (In-line Drip): इसमें निश्चित दूरी पर पाइप के भीतर ही ड्रिपर्स पहले से निर्मित होते हैं, जिससे समान रूप से पानी मिलता है।
B. स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली (Sprinkler Irrigation System): पाइप नेटवर्क से जुड़े नोजल के माध्यम से दबाव में हवा में पानी का छिड़काव किया जाता है जो वर्षा का अनुकरण करता है। यह अत्यधिक घनी फसलों (high plant density) जैसे अनाज, दलहन और मसालों के लिए सर्वोत्तम है। इसके निम्नलिखित प्रकार हैं:
पोर्टेबल स्प्रिंकलर (Portable Sprinklers): मुख्य और उप-मुख्य पाइपों को आवश्यकतानुसार खेत के विभिन्न भागों या उबड़-खाबड़ (undulating) क्षेत्रों में ले जाया जा सकता है।
माइक्रो स्प्रिंकलर (Micro Sprinklers): कम दूरी का छिड़काव करने वाले ये स्प्रिंकलर पत्तेदार सब्जियों व नर्सरी के लिए उपयुक्त हैं और पौधे के पास सूक्ष्म जलवायु परिस्थितियों (micro climatic conditions) को अनुकूल बनाने में मदद करते हैं।
मिनी स्प्रिंकलर (Mini Sprinklers): इनका उपयोग मूंगफली, आलू और अदरक जैसी फसलों के लिए किया जाता है।
अर्ध-स्थायी स्प्रिंकलर (Semi-Permanent Sprinklers): मुख्य पाइप स्थायी रूप से जमीन के नीचे दबे होते हैं, जबकि स्प्रिंकलर नोजल को बदला जा सकता है।
बड़ी मात्रा के स्प्रिंकलर/रेन-गन (Rain-Guns): उच्च दबाव पर 10,000 से 32,000 लीटर प्रति घंटे की दर से 24 से 36 मीटर के दायरे में पानी छिड़कते हैं, जिससे बहुत कम समय में बड़े क्षेत्रों की सिंचाई संभव होती है।
3. जल संरक्षण के नए नियम और बढ़ी हुई बजटीय स्वतंत्रता
स्थानीय स्तर पर स्थायी जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने पीडीएमसी योजना के नीतिगत दिशानिर्देशों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं:
अन्य हस्तक्षेप घटक (Other Interventions): राज्यों को सूक्ष्म स्तर पर जल भंडारण संरचनाओं जैसे डिग्गी (diggis/farm ponds) और जल संचयन प्रणालियों (water harvesting systems) के व्यक्तिगत या सामुदायिक निर्माण की अनुमति दी गई है।
फंडिंग की सीमा का उन्मूलन (Removal of Funding Caps): पहले, इन जल संरक्षण गतिविधियों पर होने वाला खर्च सामान्य राज्यों में कुल आवंटन का अधिकतम 20 प्रतिशत और पूर्वोत्तर, हिमालयी राज्यों तथा जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में 40 प्रतिशत तक ही सीमित था। संशोधित दिशानिर्देशों के तहत इस सीमा को पूरी तरह हटा दिया गया है। अब राज्य सरकारें अपनी विशिष्ट स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार इन सीमाओं से अधिक धनराशि भी खर्च करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
पीएम-आरकेवीवाई के तहत बजटीय लचीलापन (Restructured PM-RKVY Flexibility): अक्टूबर 2024 में पुनर्गठित योजना के तहत राज्यों को अपनी विशिष्ट कृषि आवश्यकताओं के आधार पर एक घटक (जैसे मशीनीकरण या मृदा स्वास्थ्य) से दूसरे घटक (जैसे पीडीएमसी) में धन आवंटित करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गई है।
4. रणनीतिक, आर्थिक और व्यावहारिक प्रभाव (Impact Assessment)
स्वतंत्र मूल्यांकन अध्ययनों ने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के संरेखण में सूक्ष्म सिंचाई के असाधारण लाभों को प्रमाणित किया है:
नीति आयोग मूल्यांकन (2020-21)
अध्ययन के अनुसार, पीडीएमसी अपनाने से किसानों को 10 प्रतिशत से 69 प्रतिशत तक का प्रत्यक्ष आय लाभ प्राप्त हुआ है। साथ ही, जल उपयोग दक्षता में 30% से 70% तक का सुधार देखा गया और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार के नए अवसर सृजित हुए।
आर्थिक समीक्षा (2020-21)
सूक्ष्म सिंचाई से बड़े पैमाने पर संसाधन संरक्षण लाभ दर्ज किए गए:
पानी की बचत: 20% से 48%
ऊर्जा की बचत: 10% से 17%
उर्वरक की बचत: 11% से 19%
श्रम लागत में कमी: 30% से 40%
फसल की उपज में वृद्धि: 20% से 38%
आईआईएम अहमदाबाद अध्ययन (2023)
छह राज्यों में किए गए इस अध्ययन ने पुष्टि की कि किसान मुख्य रूप से गिरते भूजल स्तर (declining groundwater levels) की समस्या से निपटने और अपनी विशिष्ट फसल आवश्यकताओं के अनुसार दीर्घकालिक लाभ प्राप्त करने के लिए इसे तेजी से अपना रहे हैं।
अखिल भारतीय प्रगति
जुलाई 2026 तक देश की 115 लाख हेक्टेयर भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के तहत लाया जा चुका है, जो भारत के शुद्ध बुवाई क्षेत्र का लगभग 8.11 प्रतिशत है। वर्ष 2025-26 के दौरान इस योजना से 12.30 lakh किसान लाभान्वित हुए, जिनमें से लगभग 20 प्रतिशत महिला किसान थीं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और राजस्थान सबसे अधिक सूक्ष्म सिंचाई क्षेत्र वाले अग्रणी राज्य रहे हैं।
5. सफलता की वास्तविक कहानी (Case Study): आंध्र प्रदेश के श्रीनिवास राव
आंध्र प्रदेश के पलनाडु जिले के एक प्रगतिशील किसान एलएएम श्रीनिवास राव की सफलता की कहानी पारंपरिक कृषि से आधुनिक कृषि में परिवर्तन का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करती है:
कृषि रूपांतरण
उन्होंने अपने दो एकड़ के अम्लीय नींबू (acid lime) के बगीचे में पारंपरिक बाढ़ सिंचाई (flood irrigation) को हटाकर ड्रिप सिंचाई प्रणाली और फर्टिगेशन (fertigation - सिंचाई जल के साथ उर्वरकों का सटीक अनुप्रयोग) तकनीक को अपनाया।
आर्थिक प्रभाव विश्लेषण
फसल की उपज: पूर्व के 90 क्विंटल से बढ़कर 105 क्विंटल प्रति एकड़ हो गई।
खेती की लागत: पहले के 3.0 लाख रुपये से घटकर केवल 2.4 लाख रुपये रह गई।
शुद्ध आय: पहले की 1.5 लाख रुपये से बढ़कर 2.85 लाख रुपये हो गई।
अतिरिक्त लाभ: उन्होंने सूक्ष्म सिंचाई के कुशल उपयोग से 1.35 लाख रुपये की शुद्ध अतिरिक्त आय अर्जित की, जिससे उनकी आजीविका अधिक मजबूत हुई।
6. निष्कर्ष / UPSC के लिए मुख्य बिंदु
प्रारंभिक परीक्षा हेतु (Prelims Focus): पीएम-आरकेवीवाई (PM-RKVY) का पुनर्गठन (अक्टूबर 2024); पीडीएमसी के तहत सब्सिडी स्तर (लघु/सीमांत को 55%, अन्यों को 45%); योजना का वर्तमान संस्थागत ढांचा (NSC, SLSC, IDWG, DLIC); ड्रिप सिंचाई के प्रकार (इन-लाइन व ऑन-लाइन) और स्प्रिंकलर के वैज्ञानिक वर्गीकरण; जल संरक्षण परियोजनाओं पर खर्च की सीमा का पूर्ण उन्मूलन।
मुख्य परीक्षा हेतु (GS Paper III - Agriculture & Geography): भारत में भूजल संकट और जल सुरक्षा के आलोक में सूक्ष्म सिंचाई प्रौद्योगिकियों का रणनीतिक महत्व; 'फर्टिगेशन' किस प्रकार पोषक तत्व उपयोग दक्षता (nutrient use efficiency) और उर्वरक सब्सिडी के बोझ को कम करने में सहायक है; सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के हिस्से के रूप में कृषि योजनाओं में राज्यों को अधिक बजटीय स्वतंत्रता देने के नीतिगत निहितार्थ।
सामान्य प्रश्न (Frequently Asked Questions - FAQs)
1. 'प्रति बूंद अधिक फसल' (PDMC) योजना क्या है?
यह कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा क्रियान्वित एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जो सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर) तकनीकों के माध्यम से जल उपयोग दक्षता बढ़ाने और संसाधन-कुशल कृषि को बढ़ावा देने के लिए चलाई जाती है। वर्तमान में यह पीएम-आरकेवीवाई (PM-RKVY) के छाता कार्यक्रम के अंतर्गत लागू है।
2. पीडीएमसी योजना के तहत किसानों को कितनी सब्सिडी मिलती है?
लघु एवं सीमांत किसानों को कुल लागत का 55 प्रतिशत और अन्य श्रेणी के किसानों को 45 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जाती है, जो अधिकतम 5 हेक्टेयर भूमि तक के लिए उपलब्ध है।
3. ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई में क्या अंतर है?
ड्रिप सिंचाई में पानी सीधे उत्सर्जकों (emitters) के माध्यम से पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है, जबकि स्प्रिंकलर सिंचाई में नोजल के माध्यम से दबाव में पानी का छिड़काव किया जाता है, जो वर्षा का अनुकरण करता है और अनाज, दलहन जैसी सघन फसलों के लिए उपयुक्त है।
4. जल संरक्षण गतिविधियों पर खर्च की सीमा को क्यों हटाया गया?
पहले सामान्य राज्यों में यह सीमा 20% और पूर्वोत्तर/हिमालयी राज्यों में 40% थी। राज्यों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार डिग्गी और जल संचयन ढांचे बनाने की पूर्ण स्वतंत्रता देने के लिए संशोधित दिशानिर्देशों में यह सीमा पूरी तरह समाप्त कर दी गई है।
5. UPSC परीक्षा के दृष्टिकोण से पीडीएमसी योजना क्यों महत्वपूर्ण है?
यह योजना GS Paper II (शासन व्यवस्था, केंद्र-राज्य संबंध) और GS Paper III (कृषि, जल प्रबंधन, आर्थिक विकास) दोनों से जुड़े प्रश्नों के लिए प्रासंगिक है, विशेष रूप से भूजल संकट, सहकारी संघवाद और किसान आय दोहरीकरण जैसे विषयों के संदर्भ में।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न (Practice MCQs)
प्रश्न 1
- वर्तमान में यह योजना 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना' (PM-RKVY) के तहत एक घटक के रूप में लागू की जा रही है।
- योजना के अंतर्गत केवल लघु और सीमांत किसानों को ही वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, जबकि बड़े किसान इसके लिए पात्र नहीं हैं।
- नए दिशानिर्देशों के तहत राज्यों को स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर जल संरक्षण और जल भंडारण गतिविधियों (जैसे डिग्गी निर्माण) पर खर्च करने के लिए पूर्व-निर्धारित बजटीय सीमा को पूरी तरह हटा दिया गया है।
- A. केवल 1 और 2
- B. केवल 2 और 3
- C. केवल 1 और 3
- D. 1, 2 और 3
उत्तर: C (केवल 1 और 3)
कथन 1 सही है: वर्ष 2022-23 से पीडीएमसी योजना को पुनर्गठित प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के छत्र कार्यक्रम के तहत लागू किया जा रहा है।
कथन 2 गलत है: इस योजना में सभी किसान श्रेणियों को वित्तीय सहायता दी जाती है। लघु और सीमांत किसानों को लागत का 55% जबकि अन्य (बड़े) किसानों को 45% की वित्तीय सहायता दी जाती है।
कथन 3 सही है: संशोधित नियमों के तहत जल संरक्षण परियोजनाओं के लिए पहले लागू सीमाओं (सामान्य राज्यों में 20% और पहाड़ी/पूर्वोत्तर राज्यों में 40%) को पूरी तरह हटा दिया गया है, जिससे राज्यों को पूर्ण वित्तीय स्वतंत्रता मिल गई है।
प्रश्न 2
- इनका उपयोग मुख्य रूप से धान और गन्ने जैसी अत्यधिक जल-गहन फसलों के लिए व्यापक पैमाने पर किया जाता है।
- ये स्प्रिंकलर कम त्रिज्या वाले होते हैं जिनका मुख्य उपयोग पत्तेदार सब्जियों, नर्सरी की सिंचाई और रोपाई को सख्त करने के लिए किया जाता है।
- सिंचाई प्रदान करने के अलावा, यह प्रणाली पौधों के पास की सूक्ष्म जलवायु परिस्थितियों (micro climatic conditions) को बदलने में भी मदद करती है।
- A. केवल 1 और 2
- B. केवल 2 और 3
- C. केवल 1
- D. 1, 2 और 3
उत्तर: B (केवल 2 और 3)
कथन 1 गलत है: धान और गन्ने के लिए व्यापक छिड़काव अनुपयुक्त है। 'माइक्रो स्प्रिंकलर' का उपयोग पत्तेदार सब्जियों और नर्सरी के लिए किया जाता है, जबकि धान जैसी उच्च पौधे घनत्व वाली अनाज फसलों के लिए सामान्य पोर्टेबल या बड़े स्प्रिंकलर्स उपयुक्त हैं।
कथन 2 और 3 सही हैं: माइक्रो स्प्रिंकलर कम रेडियस के होते हैं जो नर्सरी सिंचाई के लिए अत्यंत प्रभावी हैं। ये पौधे के आस-पास की सूक्ष्म जलवायु परिस्थितियों (micro-climates) में भी अनुकूल बदलाव लाते हैं।

