विषय सूची (Table of Contents)
- व्हाइट रैबिट टेक्नोलॉजी (White Rabbit Technology): 'भारतीय मानक समय' (IST) वितरण नेटवर्क और तकनीकी संप्रभुता। (GS Paper III: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; आंतरिक सुरक्षा - साइबर सुरक्षा और डेटा सुरक्षा)।
- इंजीनियरिंग बायोलॉजी: भारत का प्रथम स्नातक पाठ्यक्रम और 'बायोइकोनॉमी रोडमैप 2035'। (GS Paper III: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास और अनुप्रयोग; अर्थव्यवस्था- जैव-अर्थव्यवस्था)।
- 'पैमाना' (PAIMANA) डैशबोर्ड: बुनियादी ढांचा उप-क्षेत्रों की प्रदर्शन निगरानी हेतु साक्ष्य-आधारित त्रैमासिक अपडेट। (GS Paper III: बुनियादी ढांचा: परिवहन, ऊर्जा, दूरसंचार और रेलवे क्षेत्र)।
- कोडेक्स एलिमेंटेरियस कमीशन (CAC49): मसालों (बड़ी इलायची, धनिया, वैनिला) हेतु अंतरराष्ट्रीय मानक और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता। (GS Paper II: महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान; GS Paper III: कृषि और विदेशी व्यापार)।
- पारिवर्तन (PARIVARTAN) योजना: दिल्ली-एनसीआर में पुराने ट्रकों और बसों को बदलने हेतु परिचालन दिशा-निर्देश। (GS Paper II: सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप; GS Paper III: पर्यावरण प्रदूषण और संरक्षण)।
- ICAR 98वाँ स्थापना दिवस: उन्नत और जलवायु-अनुकूल फसल एवं कृषि नवाचार। (GS Paper III: कृषि- प्रौद्योगिकी, फसल विविधता और खाद्य सुरक्षा)।
- हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन: भारत की पहली स्वदेशी शून्य-उत्सर्जन हरित रेल गतिशीलता तकनीक। (GS Paper III: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- स्वदेशीकरण; बुनियादी ढांचा; पर्यावरण संरक्षण)।
1. व्हाइट रैबिट टेक्नोलॉजी (White Rabbit Technology): स्वदेशी 'भारतीय मानक समय' (IST) वितरण नेटवर्क और तकनीकी संप्रभुता
संदर्भ और रणनीतिक पृष्ठभूमि
केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी ने बेंगलुरु के जक्कूर स्थित क्षेत्रीय संदर्भ मानक प्रयोगशाला (RRSL) में 'व्हाइट रैबिट टेक्नोलॉजी' पर आधारित 'भारतीय मानक समय (IST) वितरण प्रदर्शन नेटवर्क' का उद्घाटन किया है। 'एक राष्ट्र, एक समय' (One Nation, One Time) के महत्वाकांक्षी विजन के तहत कार्यान्वित यह पहल भारत भर में एक समान, अत्यधिक सटीक और सुरक्षित समय मानक स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह परियोजना भारत की डिजिटल अवसंरचना की संप्रभुता सुनिश्चित करने और विदेशी समय स्रोतों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से शुरू की गई है।
तकनीकी और मुख्य विवरण
- प्रौद्योगिकी: यह उच्च-सटीक समय सिंक्रनाइज़ेशन तकनीक है जो नैनोसेकंड स्तर की सटीकता प्रदान करती है।
- नोडल एजेंसी: उपभोक्ता मामले मंत्रालय का विधिक माप विज्ञान प्रभाग (Legal Metrology Division) इस परियोजना के लिए नोडल एजेंसी है।
- सहयोग: इस नेटवर्क को राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (NPL), इसरो (ISRO), बीएसएनएल (BSNL) और सेबी (SEBI) जैसे प्रमुख तकनीकी संस्थानों के सहयोग से विकसित किया गया है।
- वैश्विक मानक: यह स्वदेशी प्रणाली वैश्विक समन्वित सार्वभौमिक समय (UTC) प्रोटोकॉल के पूर्ण अनुपालन में कार्य करती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के साथ तालमेल बना रहता है।
महत्व
- तकनीकी संप्रभुता: यह प्रणाली जीपीएस (GPS) जैसे विदेशी समय स्रोतों पर भारत की निर्भरता को समाप्त करती है, जिससे राष्ट्रीय डिजिटल बुनियादी ढांचे की स्वायत्तता सुदृढ़ होती है।
- साइबर सुरक्षा: बाहरी समय संदर्भों पर निर्भरता कम होने से बैंकिंग, रक्षा और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों को साइबर हमलों और डेटा हेरफेर (Data Manipulation) जैसे जोखिमों से अधिकतम सुरक्षा प्राप्त होगी।
- महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उपयोग: यह तकनीक उच्च-आवृत्ति वित्तीय बाजारों (High-frequency markets), स्टॉक एक्सचेंजों, डिजिटल बैंकिंग भुगतान, दूरसंचार नेटवर्क और राष्ट्रीय पावर ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने के लिए क्रांतिकारी सिद्ध होगी।
आर्थिक और संस्थागत पक्ष
- डिजिटल गवर्नेंस का आधार: समान समय प्रोटोकॉल भारत के भविष्य के प्रौद्योगिकी-संचालित डिजिटल शासन और सार्वजनिक सेवाओं की पारदर्शिता के लिए एक आधारभूत स्तंभ के रूप में कार्य करेंगे।
- संस्थागत तालमेल: विभिन्न तकनीकी और नियामक निकायों (जैसे NPL और SEBI) के बीच यह सफल सहयोग भविष्य के स्वदेशी नवाचारों के लिए एक मॉडल प्रस्तुत करता है।
2. इंजीनियरिंग बायोलॉजी: भारत का प्रथम स्नातक पाठ्यक्रम और 'बायोइकोनॉमी रोडमैप 2035'
संदर्भ और रणनीतिक पृष्ठभूमि
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के पहले इंजीनियरिंग बायोलॉजी (Engineering Biology) स्नातक पाठ्यक्रम की घोषणा की है और साथ ही "बिल्डिंग इंडिया एज़ अ लीडिंग बायोइकोनॉमी पावरहाउस बाय 2035" रोडमैप लॉन्च किया है। यह पहल देश की दीर्घकालिक वैज्ञानिक और आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए एक स्वतंत्र और संप्रभु जैव प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। मंत्री ने इंजीनियरिंग बायोलॉजी को जैव-अर्थव्यवस्था के अगले चरण के लिए एक आधारभूत विषय बताया, जो डिजिटल क्रांति में कंप्यूटर विज्ञान की भूमिका के समान होगा।
विवरण
- नवाचारी पाठ्यक्रम: यह देश का अपनी तरह का पहला पाठ्यक्रम है जो इंजीनियरिंग, जीव विज्ञान, चिकित्सा और उभरती प्रौद्योगिकियों के संगम पर कार्य करने वाले पेशेवरों की एक नई पीढ़ी तैयार करेगा।
- संस्थानों का तालमेल: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) ने इंजीनियरिंग और स्वास्थ्य सेवा के बढ़ते तालमेल को देखते हुए चिकित्सा संस्थानों के साथ इंटरडिसिप्लिनरी प्रोग्राम के प्रस्ताव प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है।
- प्रमुख तकनीकी स्तंभ: जैव प्रौद्योगिकी का भविष्य सिंथेटिक जीव विज्ञान (Synthetic Biology), एआई-आधारित जैविक अनुसंधान और जैव-विनिर्माण (Bio-manufacturing) द्वारा निर्धारित होगा।
- अनुसंधान के क्षेत्र: नई प्रोटीन डिजाइन करना, जीवित-सेल-आधारित दवाएं, स्वच्छ ईंधन और टिकाऊ खाद्य प्रणालियों का विकास इसके मुख्य केंद्र होंगे।
महत्व
- बायोइकोनॉमी का विस्तार: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2014 के 10 बिलियन डॉलर से बढ़कर वर्तमान में 95 बिलियन डॉलर हो गई है। इसके 2030 तक 300 बिलियन डॉलर और 2035 तक 700 बिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
- स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र: वर्तमान में भारत में 11,000 से अधिक जैव प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप हैं और 100 से अधिक बायो-इन्क्यूबेटर कार्यरत हैं।
- विकास दर: भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती जैव-अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जो 15-18% वार्षिक वृद्धि दर्ज कर रही है।
- वैश्विक नेतृत्व: भारत ने दुनिया का पहला डीएनए वैक्सीन विकसित कर और 30 देशों को इसकी आपूर्ति कर अपनी वैज्ञानिक क्षमता सिद्ध की है।
आर्थिक और संस्थागत पक्ष
- निवेश और निधि: बायोइकोनॉमी रोडमैप को ₹50,000 करोड़ के प्रस्तावित 'जैव अर्थव्यवस्था विकास कोष' (Bioeconomy Growth Fund) का समर्थन प्राप्त होगा।
- जीडीपी में योगदान: वर्तमान में जैव-अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान 4.8% है।
- नीतिगत ढांचा: भारत ने BioE3 नीति जैसी प्रगतिशील पहलें की हैं जो अर्थव्यवस्था, रोजगार और पर्यावरण के लिए जैव प्रौद्योगिकी पर केंद्रित हैं।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी: सरकार ने स्वदेशी डीएनए वैक्सीन जैसी पहलों के माध्यम से प्रौद्योगिकी विकास के शुरुआती चरणों से ही निजी क्षेत्र के सहयोग को बढ़ाने पर जोर दिया है।
3. 'पैमाना' (PAIMANA) डैशबोर्ड: बुनियादी ढांचा उप-क्षेत्रों की प्रदर्शन निगरानी हेतु साक्ष्य-आधारित त्रैमासिक अपडेट
संदर्भ और रणनीतिक पृष्ठभूमि
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने 'पैमाना' (Project Assessment, Infrastructure Monitoring & Analytics for Nation-building - PAIMANA) प्रदर्शन डैशबोर्ड का नवीनतम त्रैमासिक अपडेट जारी किया है। 16 अप्रैल 2026 को लॉन्च किया गया यह डैशबोर्ड बुनियादी ढांचा क्षेत्र की साक्ष्य-आधारित निगरानी को सुदृढ़ करने और नीति निर्माण को डेटा-संचालित बनाने की दिशा में सरकार का एक प्रमुख तकनीकी हस्तक्षेप है। इसका उद्देश्य प्रमुख बुनियादी ढांचा उप-क्षेत्रों के प्रदर्शन का एक एकीकृत और व्यापक अवलोकन प्रदान करना है।
विवरण
- संकेतकों का विस्तार: डैशबोर्ड को अब 165 संकेतकों तक विस्तारित कर दिया गया है, जिसमें इस तिमाही में 44 नए संकेतक जोड़े गए हैं।
- मानकीकृत ढांचा: यह प्रणाली बुनियादी ढांचे के प्रदर्शन की निगरानी के लिए पाँच आयामों का उपयोग करती है: पहुँच (Access), गुणवत्ता (Quality), राजकोषीय लागत और राजस्व (Fiscal Cost & Revenue), उपयोग (Utilization), और वहनीयता (Affordability)।
- क्षेत्रवार वितरण: वर्तमान में डैशबोर्ड में छह प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं: पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग (62 संकेतक), रेलवे (37), नागरिक उड्डयन (31), ऊर्जा (14), दूरसंचार (13), और सड़कें (8)।
- डिजिटल इंटरफ़ेस: यह डैशबोर्ड नीति निर्माताओं और शोधकर्ताओं के लिए इंटरैक्टिव विज़ुअलाइज़ेशन और टाइम-सीरीज विश्लेषण के साथ एक एकीकृत डिजिटल इंटरफ़ेस प्रदान करता है।
क्षेत्रवार मुख्य आर्थिक बिंदु (त्रैमासिक अपडेट)
| क्षेत्र | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| नागरिक उड्डयन | अप्रैल 2026 में माल ढुलाई (Cargo) में 11.8% की वृद्धि दर्ज की गई। साथ ही, देश में हवाई अड्डों की कुल संख्या बढ़कर 165 हो गई है। |
| दूरसंचार | वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान मोबाइल डेटा की खपत में 24.7% की वार्षिक वृद्धि देखी गई। टेलीफोन ग्राहकों की संख्या भी बढ़कर 133.06 करोड़ तक पहुँच गई है। |
| सड़क परिवहन | वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 9,360 किमी राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण किया गया। डिजिटल टोलिंग में 39.7% की वार्षिक वृद्धि देखी गई है। |
| रेलवे | ब्रॉड गेज वैगनों की औसत वहन क्षमता बढ़कर रिकॉर्ड 64.0 टन प्रति वैगन हो गई है। |
| ऊर्जा | ऊर्जा भंडारण की आवश्यकताओं में भविष्य में दस गुना वृद्धि का अनुमान है, जो 2035-36 तक 888 GWh तक पहुँच सकती है। |
महत्व
- पारदर्शिता और जवाबदेही: एक ही सार्वजनिक मंच के माध्यम से आधिकारिक डेटा उपलब्ध कराने से बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की निगरानी में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी है।
- सूचित निर्णय लेना: अद्यतन संकेतकों का समय पर प्रसार नीति निर्माताओं को अधिक सटीक और त्वरित निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।
- समावेशी विकास: पहुँच और वहनीयता जैसे आयामों पर ध्यान केंद्रित करने से यह सुनिश्चित होता है कि बुनियादी ढांचे का विकास समावेशी और सतत हो।
4. कोडेक्स एलिमेंटेरियस कमीशन (CAC49): मसालों हेतु अंतरराष्ट्रीय मानक और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता
संदर्भ और रणनीतिक पृष्ठभूमि
भारत ने स्विट्जरलैंड के जिनेवा में 6 से 10 जुलाई 2026 तक आयोजित कोडेक्स एलिमेंटेरियस कमीशन (CAC49) के 49वें सत्र में अंतरराष्ट्रीय खाद्य मानक निर्धारण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इस वैश्विक मंच पर भारत द्वारा प्रस्तावित और तैयार किए गए बड़ी इलायची, धनिया और वैनिला के अंतरराष्ट्रीय मानकों को औपचारिक रूप से अपना लिया गया है। यह विकास अंतरराष्ट्रीय खाद्य व्यापार में भारत के बढ़ते नेतृत्व, तकनीकी विशेषज्ञता और विज्ञान-आधारित मानकों के प्रति इसकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
विवरण
- Finalization of Standards: इन तीनों मसालों के मानकों को अक्टूबर 2025 में गुवाहाटी में आयोजित 'कोडेक्स कमिटी ऑन स्पाइसेस एंड कलिनरी हर्ब्स' (CCSCH) के आठवें सत्र के दौरान अंतिम रूप दिया गया था।
- Secretariat Role: भारत इस महत्वपूर्ण कोडेक्स कमोडिटी कमेटी (CCSCH) की मेजबानी करता है, जिसमें 'स्पाइसेस बोर्ड' (Spices Board) इसके सचिवालय के रूप में कार्य करता है।
- Approval Process: आयोग द्वारा अपनाने से पहले, इन मानकों को विश्लेषण और नमूनाकरण (CCMAS), खाद्य योजक (CCFA) और खाद्य लेबलिंग (CCFL) संबंधी कोडेक्स समितियों द्वारा उनके संबंधित क्षेत्रों में अनुमोदित किया गया था।
- New Leadership Role: भारत को नए खाद्य उत्पादों के लिए जोखिम विश्लेषण पर नवगठित इलेक्ट्रॉनिक कार्य समूह (EWG) के सह-अध्यक्ष के रूप में भी नियुक्त किया गया है, जिसकी अध्यक्षता यूरोपीय संघ करेगा।
महत्व
- Market Access: नए मानक वैश्विक बाजारों में गुणवत्ता संबंधी आवश्यकताओं में एकरूपता सुनिश्चित करेंगे, जिससे व्यापारिक बाधाएं कम होंगी और भारतीय निर्यातकों के लिए नए बाजारों तक पहुंच आसान होगी।
- Indigenous Recognition: बड़ी इलायची के लिए मानक अपनाना भारत के लिए रणनीतिक रूप से गौरवपूर्ण है क्योंकि यह फसल उत्तर-पूर्वी हिमालयी क्षेत्र की मूल (Indigenous) फसल है।
- Global Positioning: धनिया के लिए मानक भारत की स्थिति को और सुदृढ़ करेगा, क्योंकि भारत इस मसाले का दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों और निर्यातकों में से एक है।
- Consumer Confidence: वैनिला हेतु वैश्विक ढांचा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता लाएगा और उपभोक्ताओं के विश्वास को मजबूत करेगा।
आर्थिक और संस्थागत पक्ष
- Export Competitiveness: इन मानकों के सामंजस्य (Harmonization) से भारतीय कृषि और खाद्य उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि होगी।
- Fair Trade Practices: विज्ञान-आधारित गुणवत्ता बेंचमार्क स्थापित होने से अंतरराष्ट्रीय खाद्य व्यापार में निष्पक्ष प्रथाएं सुनिश्चित होंगी, जिससे भारतीय किसानों को उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य प्राप्त होगा।
- Technical Sovereignty: अंतरराष्ट्रीय मानक-निर्धारण प्रक्रियाओं में भारत की सक्रिय भागीदारी और सह-अध्यक्षता देश की बढ़ती तकनीकी संप्रभुता को दर्शाती है।
5. पारिवर्तन (PARIVARTAN) योजना: दिल्ली-एनसीआर में पुराने ट्रकों और बसों को बदलने हेतु परिचालन दिशा-निर्देश
संदर्भ और रणनीतिक पृष्ठभूमि
आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) ने 'परिवर्तन' (PARIVARTAN - Programme for Accelerated Renewal and Incentivization of Vehicle Assets for Reducing Transport Air Pollution and Network Emissions) योजना के परिचालन दिशा-निर्देशों को स्वीकृति प्रदान कर दी है। यह योजना Delhi - NCR में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने और स्वच्छ परिवहन व्यवस्था को प्रोत्साहित करने की प्रधानमंत्री की दीर्घकालिक कल्पना का हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में चल रहे पुराने और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले भारी वाहनों को आधुनिक BS-VI मानकों वाले या इलेक्ट्रिक वाहनों से बदलना है।
विवरण
- कुल परिव्यय: इस योजना हेतु ₹9,585 करोड़ का कुल बजटीय प्रावधान किया गया है, जिसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी ₹5,041 करोड़ है।
- कार्यान्वयन निकाय: योजना का कार्यान्वयन सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) द्वारा किया जाएगा और इसके लिए वित्तीय सहायता राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड (NCRPB) के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी।
- प्रोत्साहन पैकेज: लाभार्थियों को मोटर वाहन कर (MV Tax) में रियायत, पंजीकरण शुल्क में छूट, और वाहन ऋण पर 5% ब्याज सब्सिडी जैसे लाभ मिलेंगे।
- उद्योग भागीदारी: वाणिज्यिक वाहन बाजार के 95% हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) ने इस योजना के तहत न्यूनतम 8% छूट देने हेतु समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं।
- ईंधन सहायता: डीज़ल और सीएनजी से बदलने वाले वाहनों हेतु मासिक ईंधन वाउचर और इलेक्ट्रिक वाहनों हेतु एकमुश्त वित्तीय सहायता का प्रावधान है।
महत्व
- वायु गुणवत्ता में सुधार: पुराने ट्रकों और बसों के प्रतिस्थापन से दिल्ली-एनसीआर के वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में उल्लेखनीय सुधार होने की संभावना है।
- समन्वित दृष्टिकोण: यह योजना दिल्ली के चारों ओर भारी वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करने के सरकार के समन्वित और क्षेत्रव्यापी दृष्टिकोण को दर्शाती है।
- सतत शहरी गतिशीलता: स्वच्छ ऊर्जा आधारित वाहनों को अपनाना राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को अधिक टिकाऊ और स्वस्थ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
6. ICAR 98वाँ स्थापना दिवस: 386 उन्नत और जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों का विकास एवं कृषि नवाचार
संदर्भ और रणनीतिक पृष्ठभूमि
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप - ICAR) ने 16 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में अपना 98वाँ स्थापना दिवस मनाया। यह आयोजन परिषद की वर्ष 1928 में हुई स्थापना की स्मृति में आयोजित किया जाता है। 'विकसित भारत 2047' के विजन को साकार करने की दिशा में, ICAR ने विज्ञान-आधारित, जलवायु-अनुकूल और किसान-केन्द्रित कृषि विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है। इस अवसर पर केंद्रीय कृषि मंत्री ने ICAR को भारत के कृषि परिवर्तन का 'अग्रदूत' (Trailblazer) बताया, जिसने देश की खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
तकनीकी और मुख्य विवरण
- विविध किस्मों का विकास: पिछले एक वर्ष के दौरान ICAR ने 44 फसलों की 386 उन्नत किस्में विकसित की हैं।
- जलवायु-अनुकूलता: विकसित की गई नई किस्मों में से 94% (363 किस्में) जलवायु-अनुकूल हैं, जो बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों में कृषि स्थिरता सुनिश्चित करती हैं।
- जैव-सुदृढ़ीकरण (Biofortification): पोषण सुरक्षा को लक्षित करते हुए 29 जैव-सुदृढ़ीकृत (Biofortified) किस्में जारी की गई हैं।
- नवाचारी तकनीकें: इस अवसर पर 43 उन्नत फसल किस्में और 17 कृषि प्रौद्योगिकियाँ विमोचित की गईं, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं:
- लवणीय एवं क्षारीय मिट्टियों के प्रति सहनशील बासमती और जलवायु-अनुकूल धान की किस्में।
- भारत का पहला स्वदेशी अफ्रीकी स्वाइन फीवर (African Swine Fever) टीका और 'डिजिटल स्वाइन रोग एटलस'।
- निर्यात-उन्मुख आम उत्पादन तकनीक और लघु किसानों के लिए किफायती Cassava Harvester (कसावा हार्वेस्टर)।
महत्व
- आत्मनिर्भरता का लक्ष्य: परिषद का वर्तमान रणनीतिक फोकस दलहन और तिलहन के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाना और 'प्राकृतिक खेती' (Natural Farming) को बढ़ावा देना है।
- मांग-आधारित अनुसंधान: नीतिगत स्तर पर अब 'मांग-आधारित अनुसंधान' और प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण पर बल दिया जा रहा है ताकि नवाचारों का लाभ सीधे किसानों तक पहुँच सके।
- विस्तार नेटवर्क: कृषि विज्ञान केन्द्रों (KVK) के माध्यम से प्रयोगशालाओं से खेतों तक प्रौद्योगिकियों के तीव्र हस्तांतरण को प्राथमिकता दी गई है।
आर्थिक और संस्थागत पक्ष
- आर्थिक मूल्य सृजन: फसलों, पशुधन और मात्स्यिकी क्षेत्रों में उत्पादन वृद्धि से इस वर्ष लगभग ₹1.70 लाख करोड़ का अतिरिक्त आर्थिक मूल्य सृजित हुआ है।
- अनुसंधान का प्रतिफल: कुल आर्थिक मूल्य में केवल कृषि अनुसंधान का अनुमानित योगदान ₹55,000 करोड़ रहा है, जो कृषि विज्ञान में निवेश पर मिलने वाले उच्च प्रतिफल को दर्शाता है।
- व्यावसायीकरण: प्रौद्योगिकी के अंतिम छोर तक प्रसार हेतु 51 उद्योग साझेदारों के साथ 72 समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
- व्यापक पहुँच: ICAR की तकनीकें प्रत्यक्ष रूप से लगभग 1 करोड़ किसानों तक और डिजिटल माध्यमों से 5 करोड़ से अधिक किसानों तक पहुँची हैं।
7. हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन: भारत की पहली स्वदेशी शून्य-उत्सर्जन हरित रेल गतिशीलता तकनीक
संदर्भ और रणनीतिक पृष्ठभूमि
भारतीय रेलवे देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन (Hydrogen Fuel Cell Train) को हरी झंडी दिखाने के लिए पूरी तरह तैयार है, जो 'स्वच्छतम ईंधन' हाइड्रोजन के माध्यम से स्वयं बिजली उत्पन्न करने में सक्षम है। यह उपलब्धि कोयले और भाप के युग से निकलकर टिकाऊ और हरित ऊर्जा स्रोतों की ओर भारत की व्यापक यात्रा में एक नया अध्याय है। पिछले 12 वर्षों में हुए तीव्र विद्युतीकरण (99% से अधिक ब्रॉड गेज मार्ग) के बाद, यह पहल 'अगली पीढ़ी' की रेल गतिशीलता की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी छलांग है।
तकनीकी और मुख्य विवरण
- परिचालन मार्ग: यह ट्रेन शुरू में उत्तरी रेलवे के जिंद-सोनीपत खंड (89 किमी) पर संचालित होगी।
- क्षमता और विन्यास: यह 10 कोच वाली यात्री ट्रेन है, जिसकी क्षमता लगभग 2,600 यात्रियों की है। इसमें दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार (DPC) और आठ ट्रेलर कोच (TC) शामिल हैं।
- प्रौद्योगिकी: यह 'प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन' (PEM) फ्यूल सेल का उपयोग करती है, जहाँ हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली उत्पन्न होती है और उप-उत्पाद के रूप में केवल जल वाष्प और ऊष्मा निकलती है।
- गति: इसकी डिज़ाइन गति 110 किमी/घंटा और परिचालन गति 75 किमी/घंटा निर्धारित की गई है।
- सुरक्षा तंत्र: ट्रेन को बहुस्तरीय सुरक्षा प्रणालियों से लैस किया गया है जो हाइड्रोजन रिसाव, असामान्य गर्मी, आग की लपटों और धुएं का नैनोसेकंड में पता लगाने में सक्षम हैं।
रणनीतिक और नीतिगत महत्व
- शून्य उत्सर्जन: उपयोग के समय यह ट्रेन लगभग शून्य उत्सर्जन सुनिश्चित करती है, जिससे यह रेल परिवहन का सबसे पर्यावरण-अनुकूल रूप बन जाती है।
- ऊर्जा संप्रभुता: दहन रहित तकनीक और ट्रेन के भीतर ही बिजली उत्पादन से बाहरी बिजली आपूर्ति और आयातित डीजल पर निर्भरता समाप्त होती है।
- जलवायु लक्ष्य: यह पहल 'राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन' और भारत के 'नेट जीरो' (Net Zero) लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
- वैश्विक बेंचमार्किंग: जहाँ अधिकांश वैश्विक हाइड्रोजन ट्रेनें केवल 2-4 कोच की होती हैं, भारत की 10-कोच वाली ट्रेन इस तकनीक की उच्च-क्षमता वाली परिचालन क्षमता को प्रदर्शित करती है।
आर्थिक और संस्थागत पक्ष
- स्वदेशी क्षमताएँ: इस ट्रेन को भारत में ही डिज़ाइन, इंजीनियर और एकीकृत किया गया है। इसके निर्माण में अनुसंधान डिज़ाइन और मानक संगठन (RDSO), मेसर्स मेधा सर्वो ड्राइव्स और इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) का प्रमुख योगदान रहा है।
- हाइड्रोजन इकोसिस्टम: हरियाणा के जिंद में भारत की सबसे बड़ी रेलवे हाइड्रोजन रिफिलिंग सुविधा स्थापित की गई है, जहाँ विद्युत अपघटन (Electrolysis) के माध्यम से 'ग्रीन हाइड्रोजन' का उत्पादन और भंडारण किया जाता है।
- स्वतंत्र प्रमाणीकरण: जर्मनी स्थित TÜV SÜD द्वारा इस पूरी प्रणाली का स्वतंत्र सुरक्षा मूल्यांकन किया गया है और यह पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) के मानकों का अनुपालन करती है।
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