गोडावण (Great Indian Bustard) संरक्षण : प्रोजेक्ट GIB, सुप्रीम कोर्ट निर्णय और विश्लेषण | Aarambh Times
1. प्रस्तावना और प्रजाति विवरण
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Ardeotis nigriceps), जिसे स्थानीय रूप से राजस्थान में 'गोडावण' कहा जाता है, दुनिया के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में से एक है। यह राजस्थान का राज्य पक्षी है और भारतीय उपमहाद्वीप के शुष्क और अर्ध-शुष्क घास के मैदानों की एक प्रमुख प्रजाति (Flagship Species) मानी जाती है। इसका वजन लगभग 40 पाउंड और ऊंचाई तीन फीट से अधिक हो सकती है।
संरक्षण की स्थिति
IUCN रेड लिस्ट: गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) — 2011 से इसी श्रेणी में।
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची I (सर्वोच्च कानूनी संरक्षण)।
वर्तमान जनसंख्या: जंगली अवस्था में 150 से भी कम पक्षी बचे हैं, जो मुख्य रूप से राजस्थान के थार रेगिस्तान और गुजरात के कच्छ क्षेत्र में सीमित हैं।
2. पारिस्थितिक और सांस्कृतिक महत्व
जीआईबी केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र का प्रहरी (Sentinel of Grasslands) है।
सूचक प्रजाति (Indicator Species)
इसकी उपस्थिति एक संतुलित और स्वस्थ घास के मैदान का संकेत देती है। घास के मैदानों को अक्सर 'बंजर भूमि' मानकर उपेक्षित किया जाता है, लेकिन वे स्थानीय पशुपालक समुदायों की अर्थव्यवस्था का आधार हैं।
सांस्कृतिक विरासत
राजस्थान में गोडावण को गर्व और शालीनता का प्रतीक माना जाता है। इसे राजपूत योद्धाओं के गुणों से जोड़ा गया है और स्थानीय कला व लोकगीतों में इसका विशेष स्थान है।
बिश्नोई समुदाय का योगदान
गुरु जम्भोजी के दर्शन से प्रेरित बिश्नोई समुदाय 'पारिस्थितिक-पूजा' (Eco-veneration) का पालन करता है। हाल के वर्षों में राधेश्याम बिश्नोई (1997–2025) का बलिदान जीआईबी संरक्षण के प्रति इस समुदाय की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
3. विलुप्ति का संकट: प्रमुख चुनौतियां
जीआईबी की संख्या 1970 के दशक में 1,000 से अधिक थी, जो अब 150 से कम रह गई है। इसके पीछे कई मानवजनित और प्राकृतिक कारण हैं:
बिजली की लाइनों से टकराव (Power Line Collisions)
यह सबसे बड़ा खतरा है। जीआईबी की पार्श्व दृष्टि (Lateral Vision) अच्छी होती है, लेकिन सामने की दृष्टि कमजोर होती है, जिससे वे उड़ते समय ऊंचे बिजली के तारों को देख नहीं पाते। थार क्षेत्र में हर साल लगभग 21,000 पक्षी बिजली के तारों के कारण मर जाते हैं।
आवास का विनाश (Habitat Loss)
घास के मैदानों का कृषि भूमि में परिवर्तन और सौर व पवन ऊर्जा परियोजनाओं के अनियोजित विस्तार ने इनके प्राकृतिक आवास को कम कर दिया है।
धीमी जीवन इतिहास (Slow Life History)
ये पक्षी साल में आमतौर पर केवल एक अंडा देते हैं, जो खुले मैदान में होता है। इसके कारण अंडों के कुचले जाने या शिकार होने का खतरा अधिक रहता है।
शिकार
जंगली कुत्तों, लोमड़ियों और मॉनिटर लिजार्ड द्वारा अंडों और चूजों का शिकार एक बड़ी चुनौती है।
4. प्रोजेक्ट जीआईबी: शासन और रणनीति
5 जून 2013 को राजस्थान सरकार द्वारा 'प्रोजेक्ट गोडावण' लॉन्च किया गया था। यह किसी उपेक्षित प्रजाति को बचाने के लिए शुरू किया गया पहला बड़ा राज्य-स्तरीय मिशन था।
संस्थागत ढांचा
यह पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), राजस्थान वन विभाग (RFD) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते के तहत संचालित है।
वित्त पोषण
इस परियोजना को नेशनल कैम्पा (National CAMPA) अथॉरिटी द्वारा वित्त पोषित किया जाता है।
मुख्य स्तंभ
परियोजना का ध्यान दो प्रमुख रणनीतियों पर है — Ex-situ (बाह्य स्थाने/बंदी प्रजनन) और In-situ (आवास प्रबंधन)।
5. हालिया विकास — 2026
14 जून 2026 को केंद्रीय मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने जीआईबी संरक्षण कार्यक्रम में महत्वपूर्ण सफलताओं की घोषणा की:
कुल बंदी पक्षी (Captive Stock): संरक्षण केंद्रों में पक्षियों की संख्या बढ़कर 94 हो गई है।
प्रजनन सफलता (चौथा वर्ष): बाह्य स्थाने/बंदी प्रजनन के चौथे वर्ष में अब तक 26 चूजे पैदा हुए हैं।
प्रजनन विधियों का विवरण
कृत्रिम गर्भाधान (AI): 18 चूजे | प्राकृतिक प्रजनन: 4 चूजे | जंगली अंडों से: 4 चूजे
जंपस्टार्ट इंटरवेंशन (Jumpstart Intervention)
जंगली अंडों को उठाकर कृत्रिम रूप से सेया जाता है और बदले में जंगली घोंसलों में स्वस्थ चूजे रखे जाते हैं, ताकि आनुवंशिक विविधता बनी रहे और शिकार का जोखिम कम हो। राजस्थान में इस तकनीक के माध्यम से अब तक तीन चूजे प्राकृतिक परिवेश में सफलतापूर्वक निकले हैं।
6. वैज्ञानिक और तकनीकी हस्तक्षेप
जीआईबी को बचाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है:
बंदी प्रजनन(संरक्षण प्रजनन) केंद्र (CBC)
जैसलमेर के सैम (Sam) और रामदेवरा में आधुनिक सुविधाएं स्थापित की गई हैं। अंडों को 37.5°C तापमान और 30–40% सापेक्ष आर्द्रता पर इन्क्यूबेट किया जाता है।
टेलीमेट्री और ट्रैकिंग
आठ जीआईबी को GSM/GPS टैग पहनाए गए हैं ताकि उनकी गतिविधियों और आवास उपयोग का अध्ययन किया जा सके। डेटा से पता चला है कि प्रजनन के दौरान मादा का दायरा केवल 2 वर्ग किमी तक सीमित रहता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)
कैमरा ट्रैप इमेजेस के विश्लेषण के लिए कन्वोल्यूशनल न्यूरल नेटवर्क (CNN) मॉडल विकसित किया गया है, जो 99% सटीकता के साथ जीआईबी की पहचान कर सकता है।
शिकारी प्रबंधन
2022–23 में 71 जंगली कुत्तों और लोमड़ियों को पकड़कर प्रजनन क्षेत्रों से दूर स्थानांतरित किया गया।
7. न्यायपालिका की भूमिका: एम.के. रंजीतसिंह बनाम भारत संघ
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय जीआईबी संरक्षण नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ है।
कॉर्पोरेट पर्यावरणीय उत्तरदायित्व (CER)
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि CSR में 'पर्यावरणीय उत्तरदायित्व' भी शामिल है और 'समुदाय' की परिभाषा में प्राकृतिक जगत भी आता है।
प्रजाति सर्वोत्तम हित मानक (Species Best Interest Standard)
न्यायालय ने जोर दिया कि संकटग्रस्त प्रजातियों का अस्तित्व व्यावसायिक हितों से ऊपर होना चाहिए।
प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle)
पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली संस्थाओं (जैसे बिजली कंपनियां) को प्रजातियों की बहाली का खर्च उठाना होगा।
8. विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें — 2024-25
न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति ने संरक्षण और विकास के लिए नए दिशा-निर्देश दिए हैं:
प्राथमिकता वाले क्षेत्रों का युक्तिकरण
राजस्थान में प्राथमिकता वाले क्षेत्र को बढ़ाकर 14,013 वर्ग किमी और गुजरात में 740 वर्ग किमी कर दिया गया है।
पावर कॉरिडोर
डेजर्ट नेशनल पार्क के दक्षिण में 5 किमी चौड़ा एक समर्पित बिजली गलियारा (Power Corridor) बनाने का प्रस्ताव है।
बुनियादी ढांचे पर प्रतिबंध
प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में 2 मेगावाट से अधिक क्षमता के नए सौर या पवन पार्कों की अनुमति नहीं होगी।
भूमिगत बिजली लाइनें
राजस्थान में 33 kV की 80 किमी लाइनों को तत्काल भूमिगत करने और WII द्वारा चिन्हित 250 किमी 'महत्वपूर्ण' लाइनों को समयबद्ध तरीके से भूमिगत करने का निर्देश दिया गया है।
9. 'हरित बनाम हरित' दुविधा — The 'Green vs Green' Dilemma
जीआईबी का मामला जलवायु परिवर्तन (Renewable Energy) और जैव विविधता संरक्षण के बीच के संघर्ष को उजागर करता है।
10. आगे की राह और निष्कर्ष
प्रोजेक्ट जीआईबी का अंतिम लक्ष्य बाह्य स्थाने के माध्यम से तैयार पक्षियों को सुरक्षित जंगली आवासों में 'सॉफ्ट-रिलीज़' (Soft-release) करना है।
आवास बहाली
स्थानीय 'सेवण' घास (Lasiurus sindicus) का रोपण और शिकारी-मुक्त क्षेत्रों का निर्माण अत्यंत आवश्यक है।
सामुदायिक भागीदारी
स्थानीय समुदायों, विशेषकर पशुपालकों को संरक्षण प्रयासों में भागीदार बनाना होगा।
11. महत्वपूर्ण तथ्य एवं विश्लेषण
I. प्रमुख न्यायिक हस्तक्षेप एवं ऐतिहासिक वाद
प्राथमिक वाद: एम.के. रंजीतसिंह बनाम भारत संघ (रिट याचिका (सिविल) सं. 838/2019)
संदर्भित पूर्व-निर्णय: Centre for Environmental Law, WWF-India v. Union of India — जिसने "प्रजाति सर्वोत्तम हित" (Species Best Interest) मानक स्थापित किया। तथा T.N. Godavarman Thirumulpad v. Union of India — वन भूमि संरक्षण एवं 'ओरण' (पवित्र वन) की अधिसूचना से संबंधित।
II. उच्च-स्तरीय समितियाँ एवं प्रशासनिक निकाय
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति (21 मार्च 2024) के प्रमुख सदस्य:
निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून | डॉ. हरि शंकर सिंह, सदस्य, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड | डॉ. निरंजन कुमार वासु, पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक | श्री बी. मजूमदार, पूर्व मुख्य वन्यजीव वार्डन, महाराष्ट्र | डॉ. देवेश गढ़वी, उप-निदेशक, द कॉर्बेट फाउंडेशन | श्री ललित बोहरा, संयुक्त सचिव, MNRE | संयुक्त सचिव, MoEFCC।
सहयोगी संस्थाएं: भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) — वैज्ञानिक कार्यान्वयन की प्रमुख एजेंसी | International Fund for Houbara Conservation (IFHC) — कृत्रिम प्रजनन का अंतरराष्ट्रीय तकनीकी सहयोगी | नेशनल कैम्पा अथॉरिटी — प्रोजेक्ट जीआईबी की प्राथमिक वित्त पोषण एजेंसी।

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