सोने की मांग तथा कीमत में वृद्धि क्यों होती है?
आमतौर पर वित्तीय संकट, युद्ध, वैश्विक राजनीति में अनिश्चितता होने पर सोने की मांग में वृद्धि होती है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में वैश्विक मौद्रिक नीति (Global Monetary Policy) भी सोने की कीमतों को प्रभावित कर रही है।
सोना एक गैर-प्रतिफलित (Non-yielding) संपत्ति है, इस पर डिविडेंड (Dividend) या ब्याज नहीं मिलता है। जब मुद्रा कमजोर होती है (सामान्यतः अमेरिकी डॉलर) तब सोने की मांग में वृद्धि होती है तथा सरकार द्वारा कम ब्याज दरें (Low Interest Rates) उपलब्ध कराई जाती हैं, तब सोने की मांग व कीमत में वृद्धि होती है। डॉलर के कमजोर पड़ने पर अन्य मुद्राओं की क्रय क्षमता (Purchasing Power) बढ़ जाती है और सोने की तरफ वैश्विक आकर्षण बढ़ने लगता है।
वर्तमान परिदृश्य में सोने की गिरती कीमत के कारण:
अमेरिकी डॉलर की मजबूती: वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में डॉलर की मांग में वृद्धि तथा अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) द्वारा ब्याज कटौती (Rate Cut) में कमी के कारण डॉलर आधारित परिसंपत्ति (Dollar-denominated Assets) में अधिक निवेश हुआ है जिससे सोने की मांग में तात्कालिक आकर्षण कम हुआ है।
बाजार सुधार (Market Correction): वर्ष 2025 में सोने की कीमत में रिकॉर्ड स्तर पर वृद्धि हुई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council) के अनुसार स्वर्ण मांग पहली बार 5000 टन (Tons) पार कर गई तथा सोने की कीमत में वृद्धि हुई। जब एक लंबे समय के बाद बाजार कीमतों में गिरावट देखने को मिलती है (कम से कम 10%) तो इसे बबल बर्स्ट (Bubble Burst) प्रभाव या बाजार सुधार (Market Correction) कहा जाता है। निवेशक लाभ सुरक्षित (Profit Booking) करने के लिए हिस्सेदारी बेचने लगते हैं और इसी बिकवाली (Sell-off) से मूल्य गिरावट तेज हो जाती है।
तेल की कीमतों में वृद्धि और मुद्रास्फीति (Inflation): पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है, जिसके फलस्वरूप कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि हुई है जो कि लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर हो गया है। कठोर मौद्रिक नीति यानी हॉकिश मॉनेटरी पॉलिसी (Hawkish Monetary Policy) के चलते ब्याज दरें लंबे समय तक उच्च रहने की संभावना है। निवेशक अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड (US Treasury Bonds) की तरफ आकर्षित हो रहे हैं तथा हाई यील्ड गवर्नमेंट बॉन्ड (High-yield Government Bonds) को चुन रहे हैं। वर्तमान वैश्विक संघर्षों के चलते निवेशकों ने सोने की होल्डिंग्स (Holdings) को बेचना शुरू कर दिया है।
सोना पारंपरिक सुरक्षित आश्रय (Safe Haven) संपत्ति क्यों माना जाता है?
- जब मुद्रा कमजोर होती है या वित्तीय प्रणाली प्रभावित होती है तब सोने की विशेषता इसे एक सुरक्षित संपत्ति (Safe Asset) बनाती है क्योंकि सोना बहुत जल्दी खराब भी नहीं होता है और यह हमेशा से ही प्रचलन में रहा है।
- सोने की मान्यता विश्व भर में है, देशों के केंद्रीय बैंक (Central Banks) सोने के रिज़र्व को बढ़ाने का प्रयास करते रहते हैं।
- सरकारी ब्याज कम होने पर सोने में निवेश बढ़ जाता है।
- अमेरिकी डॉलर की मजबूती पर सोने की कीमतों में गिरावट आती है क्योंकि अन्य मुद्राओं की क्रय क्षमता (Purchasing Power) मजबूत डॉलर की अपेक्षा कम होती है।
वर्तमान परिदृश्य और अमेरिकी डॉलर:
वैश्विक तेल व्यापार डॉलर आधारित यानी कि पेट्रोडॉलर (Petrodollar) पर चलता है, जिसके चलते देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने के लिए डॉलर को इकट्ठा करने का प्रयास करते हैं।
तेल की मांग में वृद्धि के कारण डॉलर की मांग में वृद्धि होती है और सोने की जगह डॉलर आधारित प्रतिभूतियों (Securities) या परिसंपत्तियों (Assets) में निवेश बढ़ता है।
वर्तमान में ईरान, इजरायल और अमेरिका के संघर्ष के चलते हॉर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) में यातायात प्रभावित होने के कारण कच्चे तेल और एलपीजी, पेट्रोल इत्यादि की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है। इस कारण से अन्य देशों से पेट्रोलियम खरीदारी के लिए डॉलर की मांग में वृद्धि हुई है, जिस कारण से डॉलर एक मजबूत मुद्रा के रूप में उभर रहा है और सोने की तरफ आकर्षण कम हो रहा है।
भारत में सोने की मांग और भारतीय सरकार की नीतियां:
भारत में सोने की अधिकतम मांग आभूषण (Jewelry) और निवेश (Investment) के लिए की जाती है, जिसमें आभूषण की मांग सर्वाधिक है।
अगर हम भारत में सरकार की नीतियों के विकास की बात करें तो स्वतंत्रता के बाद यह नीतियां प्रतिबंध (Restriction) से औपचारिकीकरण (Formalization) की तरफ आई हैं:
प्रतिबंध और निषेध चरण (The Restriction and Prohibition Phase) 1947 से 1989:
आजादी के ठीक बाद फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट (FERA) द्वारा भारत में विदेशी मुद्रा रिज़र्व को मैनेज करने के लिए बुलियन इंपोर्ट्स (Bullion Imports) को नियंत्रित किया गया जिसका उद्देश्य था सोने की मांग और आयात को कम किया जाना। 1968 में स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम (Gold Control Act) लाया गया लेकिन इस नीति से कई विकृतियां उत्पन्न हुईं, जैसे कि सोने की तस्करी (Smuggling) और काला बाजार (Black Market)।
उदारीकरण चरण (Liberalization Phase) 1990 से 2011:
इस समय काल में सोने की आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने के लिए नीतियों में लचीलापन (Flexibility) लाया गया। गैर-प्रवासी भारतीयों (NRIs) तथा वाणिज्यिक बैंकों (Commercial Banks) को भी देश में निश्चित मात्रा में सोने के आयात के लिए अधिकृत कर दिया गया। 2007 में गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) भी शुरू हो गए।
हस्तक्षेप और पारदर्शिता चरण (Intervention and Transparency Phase) 2012 से:
2012-13 के दौरान चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) बढ़ने के कारण सरकार ने आयात शुल्क (Import Duty) 2% से बढ़ाकर 10% कर दी और 80:20 का नियम लाया गया, जिसमें 20% आयात किए गए सोने को मूल्य-वर्धित (Value-added) आभूषण इत्यादि के माध्यम से निर्यात (Export) करने को कहा गया। पिछले कुछ वर्षों में सोने का औपचारिकीकरण (Formalization) किया गया है जिसके तहत हॉलमार्किंग (Hallmarking) के साथ-साथ इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज (IIBX) भी स्थापित किया गया है। 2024 के केंद्रीय बजट (Union Budget) के माध्यम से इंपोर्ट ड्यूटी को घटाकर 6% कर दिया गया।
महत्वपूर्ण नीतियां (Important Policies):
स्वर्ण मुद्रीकरण योजना (Gold Monetization Scheme) - 2015: घरों में रखे सोने को बाजार में लाने के लिए गोल्ड मेटल लोन (Gold Metal Loan) योजना लाई गई जिसके माध्यम से कम ब्याज दरों पर लोन उपलब्ध कराया जाता था। 2017 तक इसके माध्यम से लगभग 11 टन सोने का प्रवाह (Inflow) हुआ। लेकिन स्वर्ण मुद्रीकरण योजना पूरी तरह से प्रभावी नहीं रही क्योंकि इसमें केवल लोन को ही बढ़ावा मिला।
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (Sovereign Gold Bond - SGB): सोने की भौतिक मांग को प्रतिस्थापित (Substitute) करने के लिए सरकार द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) को बाजार में लाया जाता है। इन प्रतिभूतियों में निवेशकों को सोने की वर्तमान कीमत के आधार पर एसजीबी बॉन्ड (SGB Bond) की बिक्री की जाती है तथा इसमें वार्षिक आधार पर 2.5% ब्याज भी मिलता है। इसके माध्यम से सोने को भौतिक रूप से रखने की प्रवृत्ति तथा आयात को कम करने में सहायता मिलती है।
इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज (India International Bullion Exchange - IIBX): यह भारत में सोने और चांदी के आयात को नियंत्रित करने के लिए एक संस्था है। यह व्यवस्था पारदर्शिता (Transparency) को बढ़ाने, भारतीय व्यापार और वैश्विक मानकों (Global Standards) को एक साथ लाने तथा अनौपचारिक माध्यमों (Informal Channels) पर निर्भरता को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। यह बुलियन डिपॉजिटरी रसीद (Bullion Depository Receipts - BDR) के आधार पर कार्य करती है जिसमें भौतिक धातु को मापा जाता है जो स्वीकृत वॉल्ट (Approved Vaults) में रखे होते हैं।
अनिवार्य हॉलमार्किंग (Mandatory Hallmarking): सरकार ने स्वर्ण आभूषणों और वस्तुओं पर छह अंकीय अल्फान्यूमेरिक (6-digit alphanumeric) हॉलमार्क यूनिक आइडेंटिफिकेशन (HUID) को अनिवार्य कर दिया है जो कि 1 अप्रैल 2023 से प्रभावी है। यह व्यवस्था सोने की शुद्धता तथा बीआईएस मानकों (BIS Standards) के आधार पर कार्य करती है, जिसके माध्यम से निवेशकों को और ग्राहकों को गोल्ड लोन में भी फायदा होता है।
निष्कर्ष
सोना हमेशा से ही एक सेफ हेवन एसेट (Safe Haven Asset) रहा है लेकिन वर्तमान समय में इसकी गिरती कीमतों के पीछे कई कारण हैं, जैसे कि बाजार सुधार (Market Correction), वर्तमान वैश्विक संघर्ष और डॉलर में मजबूती (Strong Dollar) इत्यादि।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: अमेरिकी डॉलर और सोने की कीमतों के बीच विपरीत संबंध (Inverse Relationship) क्यों होता है?
उत्तर: अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है। जब डॉलर मजबूत (Strong) होता है, तो अन्य मुद्राओं (Currencies) का उपयोग करने वाले खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे इसकी मांग में कमी आती है और कीमतें गिरती हैं। इसके विपरीत, डॉलर के कमजोर होने पर सोने की मांग और कीमत बढ़ती है।
प्रश्न 2: 'सेफ हेवन एसेट' (Safe Haven Asset) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: यह एक ऐसी निवेश संपत्ति है जिससे आर्थिक संकट, भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) या मुद्रास्फीति (Inflation) के समय अपना मूल्य बनाए रखने या बढ़ाने की अपेक्षा की जाती है। निवेशक जोखिम भरे बाजारों (जैसे शेयर बाजार) से पैसा निकालकर सुरक्षा के लिए सोने की ओर रुख करते हैं।
प्रश्न 3: 80:20 नियम (80:20 Rule) क्या था और इसे क्यों लाया गया था?
उत्तर: इसे 2013 में 'चालू खाता घाटा' (Current Account Deficit - CAD) को नियंत्रित करने के लिए लाया गया था। इस नियम के तहत, आयात किए गए कुल सोने का 20% हिस्सा मूल्य-वर्धित (Value-added) आभूषणों के रूप में निर्यात (Export) करना अनिवार्य था। इसे बाद में हटा दिया गया ताकि व्यापार में सुगमता बनी रहे।
प्रश्न 4: सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) भौतिक सोने (Physical Gold) से बेहतर निवेश क्यों माना जाता है?
उत्तर: एसजीबी में निवेशक को न केवल सोने की बढ़ती कीमतों का लाभ मिलता है, बल्कि निवेश की गई राशि पर 2.5% का वार्षिक ब्याज (Annual Interest) भी मिलता है। इसके अलावा, इसमें भौतिक सोने की तरह सुरक्षा, शुद्धता या मेकिंग चार्ज (Making Charges) की चिंता नहीं होती और मैच्योरिटी (Maturity) पर कैपिटल गेन टैक्स (Capital Gains Tax) से छूट मिलती है।
प्रश्न 5: इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज (IIBX) की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: IIBX का उद्देश्य भारत को वैश्विक स्वर्ण बाजार में एक 'मूल्य निर्धारक' (Price Setter) के रूप में स्थापित करना है। यह पारदर्शी व्यापार, बेहतर मूल्य खोज (Price Discovery) और सोने के आयात की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित (Streamlined) बनाने में मदद करता है, जिससे अनौपचारिक माध्यमों (Informal Channels) पर निर्भरता कम होती है।



Comments
Post a Comment