इच्छा मृत्यु (यूथिनेशिया)
इच्छा मृत्यु वह प्रक्रिया है जिसमें असाध्य पीड़ा से ग्रस्त व्यक्ति अपने जीवन को समाप्त करने की गुजारिश करता है। यह तभी मान्य होती है जब व्यक्ति किसी असहनीय पीड़ा या लाइलाज बीमारी से जूझ रहा हो। इच्छा मृत्यु को मुख्य रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया गया है: निष्क्रिय इच्छा मृत्यु और सक्रिय इच्छा मृत्यु।
सक्रिय इच्छा मृत्यु (Active Euthanasia)
सक्रिय इच्छा मृत्यु में किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए जानबूझकर घातक दवा का इंजेक्शन देना या किसी अन्य बाहरी माध्यम का उपयोग करना शामिल है। भारत में यह प्रक्रिया पूरी तरह से अवैध और एक दंडनीय अपराध है।
निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia)
निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में जीवन रक्षक प्रणालियों (Life Support Systems), जो कि बाहरी माध्यम हैं, उन्हें रोक दिया जाता है या हटा लिया जाता है। इसमें व्यक्ति को कोई घातक दवा नहीं दी जाती, बल्कि उसे प्राकृतिक मृत्यु की ओर बढ़ने की अनुमति दी जाती है।
हरीश राणा केस
जब हरीश राणा 20 वर्ष के थे, तब चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके मस्तिष्क में गंभीर चोट आई थी। तभी से वे 'परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में थे। लगभग 13 वर्षों तक इसी स्थिति में रहने के कारण उनके माता-पिता उनकी देखभाल कर रहे थे। वे एक सर्जिकल ट्यूब (पैक ट्यूब) के माध्यम से कृत्रिम पोषण (CANH) पर निर्भर थे। उनके ठीक होने की कोई उम्मीद न होने के कारण, उनके माता-पिता ने जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अपील की ताकि हरीश राणा को इस अंतहीन पीड़ा से मुक्ति मिल सके। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी। न्यायालय ने न केवल हरीश राणा की फीडिंग ट्यूब हटाने का आदेश दिया, बल्कि इस प्रक्रिया को सुरक्षित रूप से पूरा करने के लिए उन्हें एम्स (AIIMS) के Palliative Care या उपशामक देखभाल (पेलिएटिव केयर) विभाग में भर्ती करने का भी निर्देश दिया।
परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS)
परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में व्यक्ति स्वतः सांस तो लेता है और उसका निद्रा-जागरण चक्र (स्लीप साइकिल) भी बना रहता है, लेकिन उसे अपने पर्यावरण के प्रति कोई चेतना नहीं होती और न ही स्वस्थ होने की कोई उम्मीद होती है। इस स्थिति में व्यक्ति अपनी दिनचर्या का कोई भी कार्य करने में असमर्थ होता है और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर रहता है।
संवैधानिक संदर्भ और अनुच्छेद 21
यह विषय संविधान के अनुच्छेद 21 की परिधि में आता है, जो व्यक्ति को 'गरिमापूर्ण जीवन' जीने का अधिकार देता है। वर्ष 2018 में कॉमन कॉज (Common Cause) केस में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि यदि चिकित्सा विज्ञान व्यक्ति के जीवन को गरिमापूर्ण बनाने में विफल रहता है, तो कष्टदायक और कृत्रिम रूप से जीवन को लंबा खींचने से इनकार किया जा सकता है।
गरिमा का अधिकार
जीवन का अधिकार केवल सांस लेना नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा के साथ जीना है। इसी में 'गरिमा के साथ मृत्यु' पाने का अधिकार भी शामिल है। जब विज्ञान जीवन को ठीक नहीं कर सकता, तो उसे कृत्रिम रूप से पीड़ा को लंबा नहीं खींचना चाहिए।
अरुणा शानबाग केस
वर्ष 1973 में अरुणा शानबाग पर एक जघन्य हमला हुआ था, जिसके कारण उनके मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक गई और उन्हें गंभीर क्षति हुई। वे 1973 से 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' में चली गईं, जहाँ अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा उनकी देखभाल की गई। 2009 में सामाजिक कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की मांग की थी। हालांकि, न्यायालय ने उस समय इस अपील को स्वीकार नहीं किया। इसके दो मुख्य कारण थे: पहला यह कि निर्णय कौन लेगा? और दूसरा यह कि क्या उन्हें किसी बाहरी माध्यम (Ventilator) से जीवित रखा जा रहा है? उस प्रकरण में अरुणा को किसी मशीन द्वारा जीवित नहीं रखा जा रहा था, बल्कि अस्पताल के कर्मचारी उन्हें अपने हाथों से भोजन कराते थे। न्यायालय ने माना कि अस्पताल का स्टाफ ही अरुणा का वास्तविक मित्र (Next Friend) और सरोगेट है, और उनका भावनात्मक जुड़ाव सर्वोपरि है।
मौलिक देखभाल और कृत्रिम पोषण में अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मौलिक देखभाल (Basic Sustenance) और कृत्रिम पोषण (Artificial Nutrition), जो कि एक चिकित्सीय उपचार है, दोनों अलग हैं। मौलिक देखभाल में चम्मच या कप से भोजन कराया जाता है, जबकि कृत्रिम पोषण में तकनीक (जैसे पैक ट्यूब) का प्रयोग होता है, जिससे तरल पोषण सीधे शरीर में पहुँचाया जाता है। CANH (Clinically Assisted Nutrition and Hydration) एक चिकित्सीय हस्तक्षेप है और अन्य जीवन रक्षक प्रणालियों की तरह इसे भी हटाया जा सकता है।
सर्वोत्तम हित (Best Interest) का निर्धारण
जब उपचार केवल पीड़ा को बढ़ाता है और जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा खींचता है, तो गरिमा का अधिकार जीवन के संरक्षण से ऊपर हो जाता है। यदि उपचार का कोई लाभ नहीं हो रहा है और प्रक्रिया अत्यंत कष्टदायक है, तो ऐसी स्थिति में प्रकृति के नियम में बाधा उत्पन्न करना सही नहीं है और प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति दे दी जाती है। अरुणा शानबाग केस में 'जीवित रहने' को सर्वोत्तम हित माना गया था, लेकिन हरीश राणा केस में 'चिकित्सीय उपचार हटाना' उनके सर्वोत्तम हित में माना गया।
निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया
अपील: उपचार में संलग्न चिकित्सक या 'नेक्स्ट ऑफ किन' (Next of Kin/परिवार) तब अपील करते हैं जब उपचार निरर्थक हो जाए।
प्राइमरी मेडिकल बोर्ड: यह बोर्ड मरीज की स्थिति, परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट और टर्मिनल इलनेस की जांच करता है।
द्वितीय मेडिकल बोर्ड: इसमें स्वतंत्र सत्यापन किया जाता है, जिसके पैनल में सीएमओ द्वारा नामित पंजीकृत चिकित्सक होते हैं।
न्यायिक सूचना (Judicial Intimation): सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय को कानूनी रिकॉर्ड के लिए 'ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट First Class' को भेजा जाता है।
निष्पादन (Execution): एक मजबूत पेलिएटिव केयर प्लान के तहत उपचार वापस ले लिया जाता है।
न्यायालय ने सर्वसम्मति से हरीश राणा के मामले में 30 दिनों की विचार अवधि (Cooling-off period) में छूट दी, यह मानते हुए कि उनके माता-पिता का अनुरोध गहरे प्रेम से उपजा था। न्यायालय ने कहा कि यह निर्णय मृत्यु को चुनने के बारे में नहीं है, बल्कि कृत्रिम रूप से जीवन को लंबा न खींचने के बारे में है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: क्या अब निष्क्रिय इच्छा मृत्यु भारत में वैध हो गयी है?
उत्तर: हाँ — सुप्रीम कोर्ट ने उक्त निर्णय में केवल निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता दी है; सक्रिय इच्छा मृत्यु पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी।
प्रश्न: निष्क्रिय इच्छा मृत्यु और सक्रिय इच्छा मृत्यु में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: सक्रिय इच्छा मृत्यु में जानबूझकर घातक दवा देकर जीवन समाप्त किया जाता है; निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में जीवन-समर्थन प्रणाली या चिकित्सकीय हस्तक्षेपों (जैसे फीडिंग ट्यूब/CANH) को हटाकर प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति दी जाती है।
प्रश्न: क्या कृत्रिम पोषण (CANH) को हटाया जा सकता है? यह मौलिक देखभाल से अलग कैसे है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मौलिक देखभाल (जैसे चम्मच/कप से खाना) और चिकित्सीय हस्तक्षेप (CANH) अलग हैं। CANH एक चिकित्सीय उपचार है और अन्य जीवन रक्षक प्रणालियों की तरह इसे हटाया जा सकता है जब वह उपयोगी नहीं रहा हो।
प्रश्न: हरीश राणा केस में क्या हुआ और अदालत ने क्या निर्देश दिया?
उत्तर: जब हरीश राणा 20 वर्ष के थे तब उन्हें गंभीर मस्तिष्क चोट हुई और वे लंबे समय तक परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में रहे; वे पैक ट्यूब के माध्यम से CANH पर निर्भर थे। माता-पिता की अपील पर उच्चतम न्यायालय ने फीडिंग ट्यूब हटाने की अनुमति दी और प्रक्रिया सुरक्षित रूप से पूरा करने के लिए उन्हें AIIMS के पेलिएटिव केयर विभाग में भर्ती कराने का निर्देश दिया।
प्रश्न: यह निर्णय क्या 'मृत्यु चुनने' जैसा है?
उत्तर: न्यायालय ने कहा कि मामला मृत्यु चुनने का नहीं है; यह कृत्रिम रूप से जीवन को बिना लाभ के लंबा खींचने से इनकार करने का है। गरिमा का अधिकार जीवन संरक्षण पर प्राथमिक है जब उपचार केवल कष्ट बढ़ा रहा हो।
प्रश्न: क्या यह निर्णय पहले के मामलों से अलग है — जैसे अरुणा शानबाग या कॉमन कॉज से जुड़ी प्रवृत्तियों के संदर्भ में?
उत्तर: हाँ। अरुणा शानबाग प्रकरण (1973 हमला; 2009 में पिंकी विरानी द्वारा दायर याचिका) को न्यायालय ने उस समय स्वीकार नहीं किया था — मुख्य कारणों में निर्णय लेने वाले का प्रश्न और यह कि क्या वह किसी मशीन से जीवित थी, शामिल थे; असल में अरुणा को मशीन से नहीं रखा गया था और अस्पताल का स्टाफ उनका 'Next Friend' माना गया। वहीं 2018 में कॉमन कॉज केस में यह सिद्धांत स्वीकार हुआ कि यदि चिकित्सा जीवन को गरिमापूर्ण बनाने में विफल है तो जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा खींचने से इंकार किया जा सकता है। हरीश राणा केस में उच्चतम न्यायालय ने उपर्युक्त दृष्टिकोण के अनुरूप निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति दी।
प्रश्न: निष्क्रिय इच्छा मृत्यु लागू करने की क्या प्रक्रिया रहती है?
उत्तर: निर्णय के लिए चरणबद्ध प्रक्रिया दी गयी है: (1) उपचार में लगे चिकित्सक या परिवार द्वारा अपील; (2) प्राइमरी मेडिकल बोर्ड द्वारा रोगी की स्थिति की जांच; (3) द्वितीय मेडिकल बोर्ड द्वारा स्वतंत्र सत्यापन (सीएमओ द्वारा नामित पंजीकृत चिकित्सक); (4) सर्वसम्मति निर्णय की न्यायिक सूचना ('ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास') को भेजना; और (5) मजबूत पेलिएटिव केयर प्लान के तहत उपचार वापस लेना तथा निष्पादन। उक्त मामले में अदालत ने पारिवारिक अनुरोध के भावनात्मक आधार को देखते हुए 30 दिनों की विचार अवधि (Cooling-off period) में छूट भी दी।

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